
कोईरी से कुशवाहा बनने का सफर
बिहार की राजनीति में कोईरी से कुशवाहा बनने का सफर… और अब CM की दावेदारी तक की लड़ाई बिहार की राजनीति में कुशवाहा (कोईरी) समाज का सफर समझना है तो इसे साल-दर-साल, दौर-दर-दौर देखना पड़ेगा। यह कोई एक दिन का उभार नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे बना हुआ राजनीतिक उत्थान है। सबसे पहले पीछे चलते हैं औपनिवेशिक दौर में। 18वीं और 19वीं सदी में कोईरी समाज की पहचान एक कुशल कृषक के रूप में थी। खासकर सब्जी उत्पादन और अफीम की खेती में इनकी मजबूत पकड़ थी। अंग्रेजों के दस्तावेजों में इन्हें मेहनती और आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत सक्षम किसान बताया गया। यही वह समय था जब इस समाज ने जमीन और उत्पादन के जरिए अपनी आर्थिक नींव मजबूत की। फिर 20वीं सदी की शुरुआत में एक बड़ा बदलाव आता है। 1922 में अखिल भारतीय कुशवाहा क्षत्रिय महासभा का गठन होता है। यहीं से “कोईरी” से “कुशवाहा” बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। यह सिर्फ नाम बदलना नहीं था, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने की कोशिश थी। खुद को भगवान राम के पुत्र कुश का वंशज बताकर इस समाज ने अपनी पहचान को ऊपर उठाने का प्रयास किया। आजादी के बाद असली टर्निंग पॉइंट आता है। 1950 में बिहार भूमि सुधार अधिनियम लागू होता है। इस कानून ने जमींदारी व्यवस्था को तोड़ा और जो किसान जमीन पर काम कर रहे थे, उन्हें मालिक बनने का मौका मिला। इसका सबसे ज्यादा फायदा यादव, कुर्मी और कोईरी जैसी जातियों को मिला। यहीं से यह समाज आर्थिक रूप से मजबूत हुआ और गांव की सत्ता संरचना में ऊपर आने लगा। 1960 और 70 का दशक इस समाज के लिए वैचारिक क्रांति का दौर रहा। जगदेव प्रसाद का उदय होता है। 1967 में उन्होंने शोषित दल बनाया और 1968 में उनके समर्थन से सतीश प्रसाद सिंह कुछ दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने। यह घटना प्रतीकात्मक रूप से बहुत बड़ी थी, क्योंकि पहली बार पिछड़ी जाति सत्ता के शीर्ष तक पहुंची। 1974 में जगदेव प्रसाद की पुलिस गोलीबारी में मौत हो जाती है, लेकिन उनकी विचारधारा पूरे बिहार में फैल जाती है। इसी दौर (1970-90) में एक और धारा चलती है-नक्सल आंदोलन। भोजपुर, गया, रोहतास जैसे इलाकों में कई कुशवाहा युवा वामपंथी आंदोलनों से जुड़ते हैं। यह दिखाता है कि यह समाज सिर्फ चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष भी कर रहा था। अब आते हैं 1990 के दौर पर, जो बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जाता है। 1990 में लालू प्रसाद यादव सत्ता में आते हैं और मंडल राजनीति शुरू होती है। शुरुआत में यादव, कुर्मी और कुशवाहा एक साथ रहते हैं। लेकिन धीरे-धीरे यादवों का वर्चस्व बढ़ता है, जिससे अन्य पिछड़ी जातियों में असंतोष पैदा होता है। 1994 में “कुर्मी चेतना रैली” होती है और यहीं से नया राजनीतिक समीकरण बनता है। इसके बाद नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस मिलकर समता पार्टी बनाते हैं। यह “लव-कुश” (कुर्मी-कुशवाहा) गठबंधन की शुरुआत थी। 1996 में बीजेपी के साथ गठबंधन होता है और धीरे-धीरे यह गठबंधन मजबूत होता जाता है। 2005 में बड़ा बदलाव आता है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनती है। कुशवाहा समाज इस सत्ता परिवर्तन का अहम हिस्सा होता है। लेकिन 2010 के बाद यह भावना बढ़ने लगती है कि सत्ता में कुर्मी और अति पिछड़ों को ज्यादा जगह मिल रही है, जबकि कुशवाहा समाज पीछे छूट रहा है। यहीं से 2013-14 के आसपास एक नया चेहरा उभरता है-उपेंद्र कुशवाहा। 2013 में वे RLSP बनाते हैं और 2014 में बीजेपी के साथ गठबंधन कर केंद्र में मंत्री बनते हैं। यह पहला मौका था जब कुशवाहा समाज का एक नेता स्वतंत्र ताकत के रूप में उभरता है और यह साफ संकेत देता है कि यह समाज अब बंधुआ वोट बैंक नहीं रहेगा। 2015 के आसपास राजनीति में एक नया मोड़ आता है... पहचान की राजनीति। सम्राट अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य को कुशवाहा समाज से जोड़कर एक नई “मौर्य पहचान” बनाई जाती है। इससे समाज के भीतर गौरव और आत्मविश्वास की भावना बढ़ती है। 2020 के बाद राजनीति और ज्यादा बिखरती है। कुशवाहा समाज एक नेता के पीछे नहीं रहता, बल्कि कई हिस्सों में बंट जाता है... कहीं जदयू, कहीं बीजेपी, कहीं राजद, तो कहीं वामपंथ के साथ। 2023 में सम्राट चौधरी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बनते हैं और बाद में डिप्टी सीएम भी। यह बीजेपी की नई रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह ओबीसी नेतृत्व को आगे बढ़ाकर अपना आधार मजबूत करना चाहती है। 2024 का लोकसभा चुनाव इस पूरे सफर का सबसे बड़ा प्रमाण बनकर सामने आता है। हर पार्टी कुशवाहा वोट के लिए संघर्ष करती है। तेजस्वी यादव कई सीटों पर कुशवाहा उम्मीदवार उतारते हैं। औरंगाबाद जैसी पारंपरिक सवर्ण सीट पर भी कुशवाहा उम्मीदवार जीत जाता है। यह साफ संकेत है कि यह समाज अब चुनाव का रिजल्ट तय करने की स्थिति में आ चुका है। अब बात 2025 की है। पहली बार ऐसा माहौल बन रहा है कि कुशवाहा समाज सिर्फ समर्थन देने वाला नहीं, बल्कि खुद मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनना चाहता है। सम्राट चौधरी का नाम इस संदर्भ में सबसे ज्यादा चर्चा में है। लेकिन सच्चाई यही है कि अकेले यह संभव नहीं है। 4-5% आबादी के साथ कोई भी समाज सत्ता तक नहीं पहुंच सकता, इसलिए कुशवाहा राजनीति का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह किसके साथ गठबंधन बनाता है। सीधे शब्दों में समझिए... कोईरी से कुशवाहा बनने तक की यह यात्रा अब “पहचान” से निकलकर “सत्ता” तक पहुंच चुकी है। अब अगला चरण तय करेगा कि यह समाज सिर्फ सत्ता बनवाने वाला रहेगा या खुद सत्ता चलाने वाला बनेगा।