
मनुष्य में देवत्व का उभार
आज के युग में ऐसा समझा जाता है कि राम और कृष्ण जैसा होना असंभव है। लोग कहते हैं ये तो कलियुग है य...
आज के युग में ऐसा समझा जाता है कि राम और कृष्ण जैसा होना असंभव है। लोग कहते हैं ये तो कलियुग है यहां तो कोई वैसा नहीं मिलेगा। यह गलतफहमी है युग कोई भी हो मनुष्य अपने में देवत्व को उभार सकता है। जिन धामों के दर्शन में हम अपने देश का भ्रमण करते हैं वैसे ही अपने हृदय के धाम को जान सकते हैं।
वे भगवान कहलाए परंतु इसका यह मतलब नहीं कि हम मात्र उनके समक्ष झुकें और उनकी मूर्ति को प्रणाम कर चल दें। मनुष्य हो हमें यह अवसर मिला है कि अपने आप को जाना जाए, कुसंस्कारों से ऊपर उठा जाए, त्याग, प्रेम, समर्पण का जीवन जीया जाए। इतने महान देश में जन्म मिलना ही एक सौभाग्य है।
अपने देश और दूसरे देशों में यही तो भिन्नता है कि हमने जीवन को स्वप्राप्ति का साधन माना तो उन्होंने सब कुछ पाया पर अपने आप को नहीं। अपने विवेकानंद यही तो कह गए कि उठो, जागो, ऊंचे आदर्शों पर चलना सीखो, विवेक वैराग्य से अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा का विकास करो, नर सेवा नारायण सेवा के पथ पर चलो। युवा यदि जाग जाऍं तो देश उस आध्यात्मिक उत्कर्ष की ओर बढ़ सकता है जो कई भविष्य दृष्टा मनीषियों ने इस देश के बारे में कहा है।
श्री अरविन्द इक्कीस वर्ष की उम्र में जब भारत आए तो न ही हिन्दी जानते थे और न ही अपनी मूल भाषा बंगाली। यहाँ आ उन्हें जिस शांति का अनुभव हुआ वह, उन्हीं के शब्दों में, अलौकिक थी। जिस व्यक्ति को बचपन में ही विदेश पढ़ाई के लिए भेज दिया गया हो, उसी संस्कृति के रंग में जो पला हो, वह भारत आ एक गहरे संबंध का अनुभव करता है।
हम भारत में रह ही इसकी आत्मा का अनुभव न करें तो हम इसे नहीं जानते हैं। भारत कोई दूसरा राष्ट्र नहीं जिसकी पहचान भौगोलिक, आर्थिक, राजनीतिक ही हो। इसकी पहचान इसकी आध्यात्मिकता है। उसे भूल जिन जंजालों में आज यह फंसा है वह दयनीय है।
© सिद्धार्थ राणा