Siddharth Rana

Siddharth Rana

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9 Feb 2021·2 min read

भगवान से दूर

दोस्तों इस दुनिया में भगवान से अपना कोई भी नहीं। परंतु भगवान से दूर भागना आज दुनिया की आदत हो गई ...

दोस्तों इस दुनिया में भगवान से अपना कोई भी नहीं। परंतु भगवान से दूर भागना आज दुनिया की आदत हो गई है। लोग योग को अपनाना नहीं चाहते। परिवार में कई प्रकार के सदस्य होते हैं तथा उनकी जरूरतों को समझ उन्हें खुश करने के प्रयास में कई बार हम अपनी अध्यात्मिक प्रगति भूल जाते हैं। हम आत्मा को बेच देते हैं जिस पर अधिकार मात्र परमात्मा का होना चाहिए था। जीवन का लक्ष्य परमात्मा में लीन होना है ज्ञान, भक्ति, कर्म द्वारा यह हम भूल गए हैं।

हमें तो इन्हें संसार में लगाने की ही इच्छा है परन्तु यह माध्यम हैं परमात्मा तक के। बड़ी पीड़ा होती है जब लोग परमात्मा से दूर चले जाते हैं। जैसा ईसावास्योपनिषद में कहा गया है कि शत वर्ष तक जीते हुए संसार के सुख साम्राज्य को भोग अमरत्व की प्राप्ति के लिए भी प्रयत्नशील रहा जाए। पहली बात तो सभी निभा रहे हैैं परंतु अमरत्व को कोई भी नहीं साध रहा।

यह बात उन लोगों के लिए लिखी जा रही है जो ग्रह गृहस्थी में जीवन यापन कर रहे हैं। परिवार की प्रेरणा अध्यात्म होना चाहिए परन्तु अध्यात्म को समझने वाले मिलने कठिन हैं। जो व्यक्ति ध्यान नहीं करता उसे एक ध्यानी को देख यही लगेगा कि यह तो पगला गया है, संसार से विरक्त हो गया है, हमें तो काम काज संभालना है, बच्चों को देखना है ये करना है वो करना है हम ऐसे नहीं हो सकते। ऐसा व्यक्ति कल्पना में ही उलझा रह सकता है परन्तु वह ध्यानी यथार्थ में जी रहा होता है।

योग से जुड़ हम भगवान के तथा संसार के दोनो के समान रूप से हो सकते हैं। गुरुदेव पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य कहते थे कि मन भगवान में रखो और पैर संसार में। यह कितनी बड़ी बात है कि जीवन जैसा भी हो पर वह आत्मसुधार के पथ पर अग्रसर है, भगवान की ओर प्रेरित है। वही लोग जो ध्यानी के स्वभाव को गलत समझते हैं उस प्रेम से वंचित रह जाते हैं जो सबको अपना मानने की सद्बुद्धि दे। हम सीमित होना पसंद करते हैं। महान होने में हमें दिक्कत है क्योंकि वह हमारी छवि के खिलाफ है। टीवी पर बड़े लोगों को देख हम अपने को छोटा बना देते हैं परन्तु यह भूल जाते हैं कि बड़ा व्यक्ति अपने विचारों से होता है।

यदि अपनी सीमाओं को तोड़ने की तीव्र उत्कंठा नहीं तो हम कैसे अध्यात्मिक प्रगति कर सकते हैं। आज आम आदमी को अपने को आम कहना बंद करना होगा। वह आम नहीं है वह परमात्मा का अंश है जिसे इस धरती पर एक उद्देश्य के तहत भेजा गया है। जब हम अपने जीवन के उद्देश्य को आत्मा से हटा संसार में लगा देते हैं तो बिखर जाते हैं। फिर समेटना कठिन होता है। फिर वही व्यक्ति एक दिन बिस्तर पर पढ़ा कराह रहा होगा तथा भगवान से कह रहा होगा कि हे भगवान मुक्ति दे!

© सिद्धार्थ राणा

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