द मोदी शो
आज हम एक ऐसे विषय पर बात करेंगे जो अक्सर हमारी आँखों के सामने से गुज़र जाता है, लेकिन जिसकी गंभीरता पर हम शायद ही कभी ठहरते हैं। मैं बात कर रहा हूँ प्रधानमंत्री के रोड शो की। ये केवल भीड़ का जमावड़ा नहीं होते, बल्कि इनके पीछे एक गहरा राजनीतिक गणित और एक चौंका देने वाला 'शाही खर्च' छिपा होता है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि इस भव्य प्रदर्शन में हमें क्या दिखाया जाता है और क्या जानबूझकर छिपाया जाता है? सेना के परिवारों का राजनीतिक इस्तेमाल: क्या यह उचित है?
वडोदरा के हालिया रोड शो में एक तस्वीर सामने आई, जिसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। कर्नल सोफिया कुरैशी के पिता, भाई और बहन को प्रधानमंत्री पर फूल बरसाने के लिए बुलाया गया। परिवार स्वाभाविक रूप से खुश है और टीवी पर उनकी खुशी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है। लेकिन मेरा सवाल उस परिवार की खुशी से नहीं, बल्कि उस सोच से है जो सेना के सम्मानित परिवारों को ऐसे राजनीतिक आयोजनों का हिस्सा बना रही है।
क्या यह एक स्वस्थ परंपरा है? सेना एक गैर-राजनीतिक संस्था है, जिसकी पहचान देश के प्रति उसकी अटूट निष्ठा और तटस्थता है। जब सेना के परिवारों को राजनीतिक मंचों पर लाकर 'फूल बरसाने' जैसे कार्य करवाए जाते हैं, तो यह उस संस्था की पवित्रता पर सवाल खड़े करता है। अगर कर्नल कुरैशी के परिवार को बुलाया जा रहा है, तो क्या विंग कमांडर वामिका सिंह या विदेश सचिव विक्रम मिश्री के परिवारों को भी यही 'सम्मान' मिलेगा? क्या उनकी बेटी को भी बुलाया जाएगा, जिन्हें आईटी सेल ने अतीत में ट्रोल किया है?
यह समझना होगा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसे महत्वपूर्ण आयोजनों में शामिल हुए अधिकारियों के परिवारों का सम्मान, उन्हें किसी राजनीतिक रोड शो में फूल बरसाने के लिए बुलाकर नहीं किया जा सकता। यह "भुनाने" की कोशिश लगती है, न कि "बताने" की। 'ऑपरेशन सिंदूर' की सफलता का ढोल पीटते हुए, हम उन 16 जवानों को क्यों भूल गए जो पुंछ में शहीद हुए? उनकी तस्वीरें इन रोड शो में क्यों नहीं दिखतीं? उनके परिवारों को क्यों नहीं बुलाया जाता, या उनसे मिलने क्यों नहीं जाया जाता?
अगर सीमा से कोई बहादुर जवान लौटेगा, तो क्या उसे भी प्रधानमंत्री पर फूल बरसाने के लिए कहा जाएगा, या प्रधानमंत्री को उन पर फूल बरसाने चाहिए? क्या अब कलेक्टर सेना के जवानों और अफसरों के परिवारों को फोन करके बुलाने लगेंगे कि पीएम के रोड शो में आओ और फूल बरसाओ? क्या शहीद जवानों के परिवारों से भी यही कहा जाएगा? मेरा मानना है कि सिवान के शहीद रामबाबू प्रसाद या छपरा के मोहम्मद इम्तियाज के परिवारों को फूल बरसाने के लिए बुलाने की बजाय, प्रधानमंत्री को उनके घर जाना चाहिए। उनके बलिदान को उस तरीके से सम्मान देना चाहिए, जिसके वे हकदार हैं। रोड शो का 'शाही खर्च' और समय की कीमत: सार्वजनिक धन का दुरुपयोग? कांग्रेस भले ही रोड शो के औचित्य पर दूसरे ढंग से सवाल उठा रही हो, लेकिन मेरा सवाल बिलकुल सीधा है: क्या प्रधानमंत्री मोदी को इतनी बड़ी संख्या में रोड शो करने चाहिए, खासकर जब चुनाव नहीं हों? एक रोड शो के पीछे कितनी तैयारी होती है, कितने करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते हैं, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है।
गुजरात में दो दिन में चार-चार रोड शो (अहमदाबाद, गांधीनगर, भुज, वडोदरा), और फिर पटना में एक और रोड शो। क्या भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री के पास इतना फुर्सत का समय है कि वे घंटों रोड शो करते रहें? जो प्रधानमंत्री 11 साल में एक घंटे की प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए समय नहीं निकाल पाए, उनके पास रोड शो के लिए इतना समय कैसे निकल आता है? इतने कम समय में, सप्ताह में दो प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जनता के कितने सवालों के जवाब दिए जा सकते थे! कश्मीर आपकी राजनीति की प्राथमिकता में सबसे ऊपर रहता है, फिर भी पहलगाम में सुरक्षा क्यों नहीं थी? बाद में क्या कार्रवाई हुई? इन सवालों के जवाब क्यों नहीं मिलते? मुंबई मेट्रो स्टेशन के उद्घाटन के 17 दिन बाद ही बारिश में उसकी हालत खराब क्यों हो गई, जहाँ 'ट्रिपल इंजन' की सरकार है? नीति आयोग खुद तुर्की के मॉडल को अपनाने की बात करता है, जबकि सरकार तुर्की के विरोध में बयान देती है – यह विरोधाभास क्यों?
शायद इन्हीं सवालों से बचने के लिए प्रधानमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते। रोड शो से वे जनता के बीच दिखते भी रहते हैं और जनता को यह नहीं दिखाई देता कि प्रधानमंत्री सवालों से बचते हैं। जनजीवन पर रोड शो का असर: अनदेखी और असुविधाएँ – आम आदमी को क्या भुगतना पड़ रहा है? रोड शो केवल प्रधानमंत्री के हाथ हिलाने और भीड़ के नारे लगाने तक सीमित नहीं होते। इनके कारण आम जनजीवन पर भारी असर पड़ता है। अहमदाबाद में रोड शो के कारण ट्रैफिक सीमित कर दिया गया, सड़कों को घंटों बंद कर दिया गया, उड़ानें प्रभावित हुईं। कल्पना कीजिए उन लोगों की हालत, जिन्हें अस्पताल जाना था, अपनी फ्लाइट पकड़नी थी, या सिर्फ अपने रोज़गार के लिए निकलना था। क्या उन्हें पता भी चला कि वे इस असुविधा को क्यों झेल रहे हैं? मुंबई में हुए हालिया रोड शो के दौरान, जहाँ कुछ दिन पहले ही एक होर्डिंग गिरने से 16 लोगों की मौत हुई थी, मेट्रो सेवाओं को मात्र एक घंटे पहले की घोषणा पर बंद कर दिया गया। इससे भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हो गई। क्या इन 'शाही' आयोजनों की कीमत आम आदमी की परेशानियों से ज़्यादा है?
बेतुके खर्च और गलत प्राथमिकताएँ: जनता के पैसों की बर्बादी पर सवाल – अनावश्यक व्यय? कर्नाटक में प्रधानमंत्री के दो दिन के दौरे पर 6 करोड़ 43 लाख रुपए खर्च हुए, जिसमें एक एयरपोर्ट के उद्घाटन पर ही 21 करोड़ रुपए लगे। लोगों को लाने-ले जाने पर ही सवा पाँच करोड़ खर्च हुए। मंच, वॉटरप्रूफ पंडाल, ग्रीन रूम – सब पर करोड़ों उड़ा दिए गए। पीएम किसान सम्मान निधि के वितरण कार्यक्रम पर 13 करोड़ से ज़्यादा खर्च हुए, जिसमें किसानों को लाने-ले जाने पर 4 करोड़ 37 लाख रुपए खर्च हुए। जब देश की 80 करोड़ से ज़्यादा आबादी मुफ्त राशन पर निर्भर है, जब लोग बिना इलाज के मर जाते हैं क्योंकि उनके पास पैसे नहीं होते, तब इस तरह के 'उत्सवों' पर करोड़ों बहाना क्या सही है? ये पैसे लोगों के इलाज पर, उनके कल्याण पर खर्च हो सकते थे, जिससे सरकार को कहीं ज़्यादा वास्तविक प्रशंसा मिलती। आजकल हर शिलान्यास और उद्घाटन प्रधानमंत्री ही करते हैं। रेल मंत्री को हरी झंडी दिखाते देख लोग अचरज में पड़ जाते हैं। क्या शिवमोगा जिले के एयरपोर्ट का उद्घाटन कोई सांसद या नागरिक उड्डयन मंत्री नहीं कर सकते थे? इससे कितने पैसे बच जाते!
2014 से पहले हम पत्रकारों की यही समझ थी कि प्रधानमंत्री का वक्त अनमोल होता है, उन्हें अपनी कुर्सी छोड़कर कम ही निकलना चाहिए, क्योंकि इससे शहर में सुरक्षा व्यवस्था बदल जाती है और भारी खर्च होता है। लेकिन अब प्रधानमंत्री घंटों रोड शो करने लगे हैं। तो फिर काम कब कर रहे होंगे? यह सही है कि प्रधानमंत्री को कमरे में बंद नहीं किया जा सकता, न ही उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगाई जा सकती है। लेकिन इसकी कुछ तो सीमाएँ होनी चाहिए। कर्नाटक में दो दिन के कार्यक्रम में 36 करोड़ से ज़्यादा का खर्च क्या उचित है? क्या मिलता है देश को इन 'शो' से? एक वास्तविकता की जाँच! पटना, जो स्वच्छता सर्वेक्षण में 400 से ज़्यादा शहरों में 77वें स्थान पर है, वहाँ भी प्रधानमंत्री का रोड शो होने वाला है। चुनावी साल है, प्रधानमंत्री दो दिन पटना में रहेंगे। हमारा सवाल है: क्या हर शिलान्यास और उद्घाटन प्रधानमंत्री को ही करना चाहिए? बाकी मंत्री क्या कर रहे हैं?
बिहार सरकार को अब साथ का साथ बता देना चाहिए कि प्रधानमंत्री के आज के दौरे पर कितना खर्च हुआ। इससे गरीब राज्य को यह जानकर बहुत खुशी होगी कि भले ही उसकी ज़्यादातर आबादी महीने का 10,000 भी नहीं कमा पाती, लेकिन उसका बिहार प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों पर 20 से 30 करोड़ खर्च कर देता है। भारत की राजनीति को देखने का नज़रिया अब बदलना होगा। इन रोड शो से देश को क्या मिलता है? 'नज़दीक से देखने का मौका' जैसी बातें भावुक हो सकती हैं, लेकिन राष्ट्र के लिए इसका वास्तविक लाभ क्या है? जब प्रधानमंत्री दिन-रात टीवी और सोशल मीडिया पर दिखते हैं, जब गोदी मीडिया बिना सवाल के उनकी हर बात चलाता है, तब उन्हें रोड शो क्यों करने पड़ते हैं? यह सोचने का विषय है कि 11 साल में प्रधानमंत्री मोदी ने कितने रोड शो किए, और उन पर कितना खर्च हुआ। काश, इसकी एक विस्तृत रिपोर्ट जनता के सामने होती।
