Popular Dialogues of Mahabharata
आँखे देखे मौन मुख, सहा कहा नहीं जाए। लेख विधाता का लिखा, कौन किसे समझाए, कौन किसे समझाए।।
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वचन दिया सोचा नहीं होगा क्या परिणाम। सोच समझकर कीजिए जीवन में हर काम।।
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आस कह रही श्वास से, धीरज धरना सीख। मांगे बिन मोती मिले, मांगे मिले ना भीख, मांगे मिले ना भीख।।
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शत्रु धराशाही हुए ज्यूँ आँधी के आगे। है ये गंगा पुत्र का, पहला ही संग्राम ।।
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हे अपराधी भावना मृत्यु कामना मूल। गया अग्नि रथ रहे गए शेष चिता के फूल।।
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क्रुद्ध सर्पिनी बन गई, सुंदर उपवन बेल। दोष किसी का क्या भला, भाग्य खेलाए खेल।।
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माता यह संभव नहीं भीष्म करे व्रत त्याग। हे शीतल सूर्य हो, बरसे शशि से आग।।
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जीवन दाता एक है समदर्शी भगवान, जैसी जिसकी पात्रता वैसा जीवन दान, वैसा जीवन दान।
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तमस रजस सद्गुणवती माता प्रकृति प्रधान, जैसी जननी भावना वैसी ही संतान, वैसी ही संतान ।।
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दे हस्कर वर को विदा, वीर वधू की रीत। राजधर्म की नीति ये, क्षत्राणी की प्रीत।।
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दे अशीष ऋषि देव ने तुम्हें सदा वरदान। गोद भरे जुग जुग जिये भाग्यवंत संतान।।
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समय भूमि गोपाल की भूले जब संसार। धार सुदर्शन चक्र की हरे भूमि का भार।।
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नारी तेरे दुःख में नारायण दुःखमंत। रो मत तेरी खोख में आएंगे भगवंत।।
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कृष्ण पक्ष की अष्टमी अर्धरात्रि बुधवार, कारागृह में कंस के भयो कृष्ण अवतार, भयो कृष्ण अवतार।
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चली कुमारी नंदिनी, आए नंद कुमार। त्याग बिना संभव नहीं, जीव जगत उद्धार, जीव जगत उद्धार।।
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अत्याचारी कंस की कुमति बनी तलवार। अंत तुझे खा जाएगा तेरा अत्याचार।।
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धीर धरो माँ देवकी, दिन न दूर सुख मूल। अश्रु बनेंगे जननी के कल्पलता के फूल।।
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मनमोहन की मोहिनी, हरे अहम अभिमान। माया को मोहित करें, मोहन की मुस्कान।।
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पापी है दोनों असुर अहंकार अभिमान। दोनों का मर्दन करे तत्सदीय भगवान।।
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गोवर्धन धारण करें लीलाधर बृजराज, मोर मुकुटधर, वेणुधर, गिरिधर बन गए आज, गिरिधर बन गए आज।
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गो पृथ्वी वाणी किरण, गति मती माता ज्ञान। गौमाता को पूजकर, तिलक करें भगवान।।
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मारक संहारक नहीं उद्धारक श्रीनाथ, सदगती पाई असुर ने, मर कर हरी के हाथ।
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जन्म मरण के मध्य है, जीवन कर्म प्रधान। उज्ज्वल जिसका कर्म हो, जीवन वही महान, जीवन वही महान।।
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माता ममता मूर्ति के, पंच पुजारी प्राण। माता का आशीष ही, पुत्रो का कल्याण।।
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गुरुकुल गुरुकुल के प्रमुख, विद्या बुद्धि निधान। सद्गुण को ही सुलभ है, सद्गुण की पहचान।।
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शिष्य सरल सतपत्र को, फलता है गुरुज्ञान। गुरु की राखे आन जो, रहे उसी की आन, रहे उसी की आन।।
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नवयुग का आरम्भ है, पाञ्चजन्य जयघोष, नाद सुजन परितोष प्रद, दुर्जन के प्रति रोष।
