फ़िल्म "83" खुशी, इमोशन, हौसले और नॉस्टेल्जिया का एक कंप्लीट पैकेज है।
एक इतिहास 1983 में कपिल देव की अगुआई वाली भारतीय क्रिकेट टीम ने वर्ल्ड कप जीतकर रचा था। जिसके गवाह टीम मेम्बर के अलावा महज सैकड़ों भारतीय ही थे। क्योंकि उस वक़्त हम भारतीय को भी इस बात का यकीन नहीं था हमारी टीम वर्ल्ड कप तो दूर, टूर्नामेंट का एक मैच भी जीत पाएगी। दूसरी सच्चाई ये भी थी कि तब हम इतने सुविधा सम्पन्न भी नहीं थे जो इस मैच का आँखों-देखा हाल देख या सुन सके।
दूसरा इतिहास 2021 में निर्देशक कबीर खान और लेखक संजय पूरण सिंह व वासन बाला की जोड़ी ने रचा है। जिन्होनें 1983 वर्ल्ड कप जीत की कहानी को न सिर्फ करोड़ों भारतीय तक पहुंचाया हैं बल्कि उस ऐतिहासिक क्षण को महसूस करने का मौका भी दिया। क्योंकि इतिहास बनाना आसान है, इतिहास को दुबारा रिक्रिएट करने या दुहराने के। फ़िल्म "83" खुशी, इमोशन, हौसले और नॉस्टेल्जिया का एक कंप्लीट पैकेज है। जिसकी कहानी में स्क्रिप्ट से लेकर संवाद तक कहीं भी कोई कमी नजर नहीं आती। फ़िल्म में कई जगह पर नाटकीयता का पुट डाला गया है पर उससे फिल्म का कथानक और मजबूत ही हुआ है, हल्का नहीं।
भारत जैसे देश में जहाँ क्रिकेट हमारा राष्ट्रीय खेल न सही पर राष्ट्रीय धर्म जरूर है। ...और इस बात को फ़िल्म का वो दृश्य और प्रमाणित कर जाता है। जब भारत में हो रहे दंगे का जिक्र आता है तो लगता है कि कहानी कहीं भटक न जाएं, लेकिन ऐसा होता नहीं है। बॉर्डर से लेकर गाँवों तक फिल्म ये संदेश देने में कामयाब होती है कि क्रिकेट को लेकर हमारा जुनून आपसी नफरतें तक खत्म करा सकता है। फ़िल्म में कलाकरों के चयन से लेकर उनके किरदारों को गढ़ने तक कास्टिंग टीम, लेखक और निर्देशक की जुगलबंदी बखूबी नज़र आती है।
लेकिन इस फ़िल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज रणवीर सिंह हैं। जिनकी अदाकारी और हाव-भाव को देखकर कभी भी ऐसा लगता ही नहीं की पर्दे पर रणवीर सिंह हैं। मानों उनके अंदर कपिल देव की आत्मा ही प्रवेश कर गई हो जैसे। लुक, मेकअप तक तो हूबहू बन जाते हैं पर रणवीर नें तो कपिल पाजी की स्टाइल और आवाज़ तक हूबहू निकाली है। सच कहें तो सारे क्रू की मेहनत एक तरफ और फ़िल्म की जान रणवीर सिंह की मेहनत एक तरफ। भई इस बंदे की जितनी तारीफ़ करें वो कम होगी। क्योंकि ऐसे बहुत कम ही एक्टर होते हैं जो अपनी अदाकारी का बेंचमार्क खुद ही सेट करते हो और अपने अगले किरदार में खुद ही उसे तोड़ देते हो। सच कहूं तो वर्तमान में बॉलीवुड में रणवीर सिंह का कोई जवाब नहीं।
बाक़ी दीपिका पादुकोण अपने छोटे किरदार में भी प्रभावी लगी हैं। वहीं कमेंटरी करते बोमन ईरानी हो या कपिल की मां बनीं नीना गुप्ता अपने-अपने किरदार में दोनों चार चाँद लगा रहे हैं। अब टीम के मैनेजर मान सिंह (पंकज त्रिपाठी) के बारें में क्या ही कहें, अब तो ऐसा लगने लगा है कि किरदार इनके लिए नहीं बल्कि ये एक से एक चैलेंजिंग और करियर डिफायनिंग किरदार के लिए बने हों।
इस फ़िल्म में वो सब कुछ है जो एक दर्शक किसी फिल्म में ढूंढता है। फिर चाहे वो कॉमेडी हो, रोमांस हो या एक्शन। ये फ़िल्म महज भारत के विश्व विजेता बनने के पलों को ही जीवंत नहीं बनाती। जिसे देखते हुए एक पल को दर्शक ये भूल ही जाते हैं कि वो स्टेडियम में नहीं हॉल में बैठे हैं। बल्कि उस नॉस्टेल्जिया में भी ले जाती है जब टीवी देखने के लिए एंटीना घुमाकर सिग्नल पकड़ाने की जद्दोजहद करनी पड़ती थी।
गानों की बात करें तो भारत के हर खेल में स्पोर्ट्स एंथम की तरह इस फ़िल्म का गाना ‘परचम लहरा दो' आने वाले दिनों में आपको बजता हुआ सुनाई देगा। आख़िर में यही की ये फ़िल्म मेट्रों सिटीज के दर्शकों को भी मल्टीप्लेक्स में खड़े होकर सिटी बजाने, जोश में चिल्लाने और अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अनुभव देती है। जिसके लिए अब तक छोटे शहरों के सिनेमाघर ही प्रचलित थे। कुल मिलाकर कहें तो कबीर खान का निर्देशन बेहद सधा हुआ है। वह कहीं भी न तो भटके हैं न ही अटके हैं। दशकों में एकाध ही ऐसी फिल्में बनती है जो हर चीज़ से परिपूर्ण होती है। इसलिए मेरे लिए तो ये मस्ट वॉच मूवी थी।
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